कैसे ढालूँ लब्ज़ो में तुझे, तू ठहरता ही नहीं कहीं , रोज़ उड़कर आ जाता है मेरे ख़्यालों में, कभी ज़ुल्फ़ों से खलता है मेरी, कभी उँगलियों से निशान बनाता है हथेली पर, अपनी पलकों को खोल देता है मेरे लिए , बिना बोले मेरे कह जाता है , हज़ार फलसफे खुद ही अकेले, टकटकी लगाए देखता है मुझे तू घण्टों , जैसे पिघल कर मुझे गंगा बना जायेगा मोहब्बत के हर पल को जीता है मेरे साथ ऐसे, जैसे मर के मुझे अमर बना जायेगा, कैसे ढालूँ शब्दो में तुझे ,तू ठहरता ही नहीं कही..
उम्मीदों की तरह हर पल साथ चलते रास्ते , ना थकते, ना रुकते, ना उम्मीद कभी छोड़ते ये रास्ते , कई ख्वाइशों, अरमानों को लेकर चलते ये रास्ते, नए हौसलों को छू कर उम्मीद की डोर थामे रास्ते, हर कदम पर, अपनों सा एहसास देते ये रास्ते, हर कदम को मज़िल देकर,खुद खामोश रहते ये रास्ते, ज़िन्दगी के लम्बे सफर को नया नाम देते ये रास्ते, कभी तपती धुप में झुलस कर, ठंडी छॉव की राह देखते ये रास्ते, बारिश की बूंदों में भीगे, हँसते गुनगुनाते भी ये रास्ते, ज़िन्दगी की खुशियों में गीत गाते ये रस्ते, मौत के मातम में खामोश हो जाते ये रास्ते, हम तो शायद मिट भी जाएँ, ज़िन्दगी हमारी थम भी जाये, पर ना जाने कहाँ जाने को निकले, ना थमते, ना रुकते, ना उम्मीद छोड़ते ये रास्ते।
Comments
Post a Comment