गुस्सा

कभी किसी लड़की का गुस्सा देखा है तुमने, कितनी तहों में छुपा रहता है, कितनी बातों को समेटे खुद में, अंदर ही अंदर बस दबा रहता है। इस डर से के कही बहा न ले जाये उन रिश्तों को जिनकी आदत है उसे। हर बार जब तुम टाल जाते हो उसके ज़रूरी काम को अपने बहोत ज़रूरी काम के आगे, वो तब भी गुस्सा होती है, पर तुम्हे उसके समझदारी के आगे गुस्सा नज़र नहीं आता, सुबह से शाम ऑफिस के काम से वो भी थक के ऊब चुकी होती है, लेकिन तुम आके जब उससे लाड़ प्यार की मांग करते हो, वो तब भी गुस्सा होती है, पर तुम्हें उसका मासूम चेहरा नज़र आता है, गुस्से में दहकता दिल नहीं। 


तुम्हारे लेट रिप्लाई से नहीं तुम्हारे नो रिप्लाई से वो गुस्सा होती है, तुम्हारे रोज़ रोज़ नए बहाने से नहीं,तुम्हारे रोज़ रोज़ की तस्सली देने से वो गुस्सा होती है। तुम्हारे सच कहने से नहीं, तुम्हारे झूठ को छुपाने से वो गुस्सा होती है, कह के तुम्हारी भूलने की आदत से वो गुस्सा होती है,तुम्हारी अपनी कही बात और अपने ही दिए वादे को पूरा ना कर पाने में वो गुस्सा होती है, उससे सिर्फ अच्छाई की उम्मीद रखने वाले तुम्हारे भर्म से वो गुस्सा होती है, वो यूँ ही अपने अंदर कई बातों को समेटे रख, तुम्हें वो बल देती है, तुम्हे कल की उम्मीद देती है, निराशा में तुम्हें संभाल कर आशाओं भरा कल देती है। 

रोज़ देखती है, झेलती है ज़माने की खा जाने वाली नज़र, जो रोज़ उसके तन को अपना हक़ समझ घूरते हैं, अपवित्र करते है रोज़ महिला होने के मान को,वो सहती है लोगों सड़ती मानसिकता, लोगो की ईर्ष्या,अपनों के ताने, तुम्हारे झूठे वादे, फिर भी संभाले रखती है अपने अंदर सब  कुछ बहा ले जाने वाले ख़ौलते गुस्से को, क्योंकि जिस दिन सब्र का बांध टूट गया, न जाने क्या क्या भेंट चढ़ जायेगा, किन किन रिश्तों को बहा ले जायेगा अपने साथ। वो चुप है तो दुनिया सुन्दर है तुम्हारी। उसे शांत ही रहने दो, मत दो मौका उसे की उगल दे अपना गुस्सा, रौद्र रूप की आंच से तुम जल जाओगे। राख़ हो जायेगी तुम्हारी दुनिया।

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